नादां वो सवाल उठाते रहे, तालीम पर हमारी, हर बददयानत ने उँगली उठाई, नियत पर हमारी। हमने तो आईना दिखाया था जमाने को सरे-आम, पतथर ही बरसते रहे लेकिन, मासूमियत पर हमारी। जो खुद ही बिके...
इक दिखावा था पूछना उनका, खैरियत हमारी, मशगूल अपनी धुन में रहे, न सुनी हालत हमारी। भीड में भी जो तनहा रहे, वो हम ही तो थे, सबको मंजूर थी जुररत, पर न सूरत हमारी। वकत ने हमसे सीखा है...