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मसला तो बस रोटी का है, साहेब
वरना वो कहां इतना मजबूर होता
उसके भी दिल में कुछ सपने पलते
आँखों में जिनहें पाने का नूर होता

पर कया करें, जब भूख दसतक देती है
तो सपनें महज लकीरों पर...

नादां वो सवाल उठाते रहे, तालीम पर हमारी,
हर बददयानत ने उँगली उठाई, नियत पर हमारी।
हमने तो आईना दिखाया था जमाने को सरे-आम,
पतथर ही बरसते रहे लेकिन, मासूमियत पर हमारी।
जो खुद ही बिके...

इक दिखावा था पूछना उनका, खैरियत हमारी,
मशगूल अपनी धुन में रहे, न सुनी हालत हमारी।
भीड में भी जो तनहा रहे, वो हम ही तो थे,
सबको मंजूर थी जुररत, पर न सूरत हमारी।
वकत ने हमसे सीखा है...