उसकी ही छांव तले आराम करने लगे
जिसे काटते- काटते थक गए थे, बेपीर
बेशरमी की इनतेहाँ से, वाकिफ जो न थे
न कुलहाडी रूकी,न ही फलों का गिरना
फिर एक आखिरी परहार भी कर दिया
और धराशायी हो गया धरा का रकषक
बेजुबां, शायद कुछ कहना चाह रहा था
पर कयूं सवारथी कानों तक बात न पहुंची
टुकडे टुकडे कर दिए हर एक शाख के उसने
जलती धूप में खुद भी पसीना पसीना हो गया
शाख के हर एक टुकडे की अहमियत थी, कि
चूलहे धरी कढाई को भी आग का इंतजार था
वो अब, हमसे शायद ही कुछ उममीद रखते हों
पर हम तो उनके बिना निशचित ही नाउममीद है
कयों...