भारत की जेलों को सामानयतः दंड के परतीक के रूप में देखा गया है, जबकि उनका वासतविक उददेशय सुधार है। यह पुसतक इसी उददेशय को दृषटिगत रखकर लिखी गई है – ताकि हम जेलों को न केवल सजा देने का सथान, बलकि संभावनाओं का भी केंदर मान सकें।"पिंजरे का परिंदा" एक परतीक है – उस आतमा का जो आजादी से वंचित होकर भी सृजनशील बनी रहती है। इस पुसतक के अधयाय उन अनुभवों,...
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