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पिंजरे का परिंदा

आजादी की उड़ान

भारत की जेलों को सामानयतः दंड के परतीक के रूप में देखा गया है, जबकि उनका वासतविक उददेशय सुधार है। यह पुसतक इसी उददेशय को दृषटिगत रखकर लिखी गई है – ताकि हम जेलों को न केवल सजा देने का सथान, बलकि संभावनाओं का भी केंदर मान सकें।"पिंजरे का परिंदा" एक परतीक है – उस आतमा का जो आजादी से वंचित होकर भी सृजनशील बनी रहती है। इस पुसतक के अधयाय उन अनुभवों,...

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नियति

एक तयशुदा संघर्ष

यह पुसतक नियति एक तयशुदा संघरष एक बालक की जीवनयातरा है, जिसने झुगगियों और गरीबी की अंधेरी गलियों से निकलकर अपने संघरष को हथियार बनाया और समाज के सामने यह सिदध किया कि गरीबी नियति नहीं, बलकि एक असथायी चुनौती है।

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अंतरतम

सजग जीवन की कला

इस पुसतक की रचना का उददेशय है— मनुषय को तनाव, चिंता और भय से बाहर निकलने का सरल मारग देना। यह दिखाना कि आधयातमिकता केवल साधु-संतों के लिए नहीं, बलकि सामानय जीवन जीने वालों के लिए भी है। पाठक को वयावहारिक अभयासों और अनुभवों के माधयम से आतम-अनवेषण की ओर ले जाना।

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