पिंजरे का परिंदा

आजादी की उड़ान

About

भारत की जेलों को सामान्यतः दंड के प्रतीक के रूप में देखा गया है, जबकि उनका वास्तविक उद्देश्य सुधार है। यह पुस्तक इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखकर लिखी गई है – ताकि हम जेलों को न केवल सज़ा देने का स्थान, बल्कि संभावनाओं का भी केंद्र मान सकें।"पिंजरे का परिंदा" एक प्रतीक है – उस आत्मा का जो आज़ादी से वंचित होकर भी सृजनशील बनी रहती है। इस पुस्तक के अध्याय उन अनुभवों, संघर्षों और परिवर्तनों की दास्तान हैं, जिन्हें मैंने एक प्रहरी के रूप में अपनी आँखों से देखा, और दिल से महसूस किया।यह पुस्तक न केवल पाठकों को जेलों के भीतर की दुनिया से परिचित कराएगी, बल्कि उन्हें सोचने पर भी विवश करेगी कि हम एक समाज के रूप में किस दिशा में जा रहे हैं, और हमें किस ओर जाना चाहिए।

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भारत की जेलों को सामान्यतः दंड के प्रतीक के रूप में देखा गया है, जबकि उनका वास्तविक उद्देश्य सुधार है। यह पुस्तक इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखकर लिखी गई है – ताकि हम जेलों को न केवल सज़ा देने का स्थान, बल्कि संभावनाओं का भी केंद्र मान सकें।"पिंजरे का परिंदा" एक प्रतीक है – उस आत्मा का जो आज़ादी से वंचित होकर भी सृजनशील बनी रहती है। इस पुस्तक के अध्याय उन अनुभवों, संघर्षों और परिवर्तनों की दास्तान हैं, जिन्हें मैंने एक प्रहरी के रूप में अपनी आँखों से देखा, और दिल से महसूस किया।यह पुस्तक न केवल पाठकों को जेलों के भीतर की दुनिया से परिचित कराएगी, बल्कि उन्हें सोचने पर भी विवश करेगी कि हम एक समाज के रूप में किस दिशा में जा रहे हैं, और हमें किस ओर जाना चाहिए।