February 1, 2026
ग़ज़ल

नादां वो सवाल उठाते रहे, तालीम पर हमारी,
हर बद्दयानत ने उँगली उठाई, नियत पर हमारी।
हमने तो आईना दिखाया था ज़माने को सरे-आम,
पत्थर ही बरसते रहे लेकिन, मासूमियत पर हमारी।
जो खुद ही बिके थे हर अहद में सिक्कों के बदले,
वो ख़ुत्बे देने लगे अक्सर, ईमानियत पर हमारी।
हम दर्द को भी तहज़ीब में ढाल कर लिखते रहे,
हँसी उड़ाई गई हर बार, इक़बालियत पर हमारी।
जिनके किरदार में मक्कारी का ज़हर भरा था,
वही पहरे बिठाते रहे उम्र भर, मेहनत पर हमारी।
हमने तो चाहा था इंसाँ को बस इंसाँ समझना,
पर शहर ने तौला हमें, हैसियत पर हमारी।
सच बोलने की यही तो क़ीमत ठहरी है शायद,
हर अहद में उँगली उठी, हिम्मत पर हमारी।