इक दिखावा था पूछना उनका, ख़ैरियत हमारी,
मशग़ूल अपनी धुन में रहे, न सुनी हालत हमारी।
भीड़ में भी जो तन्हा रहे, वो हम ही तो थे,
सबको मंज़ूर थी जुर्रत, पर न सूरत हमारी।
वक़्त ने हमसे सीखा है सब्र का हुनर शायद,
हर घड़ी आज़माता रहा, सब्र की ताक़त हमारी।
जिनके दम से कभी घर में उजाला रहता था,
आज दीवारों ने भी पहचानी न ज़रूरत हमारी।
हमने तकल्लुफ़ से सजाई थी जिनकी दुनिया,
उन्होंने सौदों में तोली हर एक क़ीमत हमारी।
क़द्र करना जिसे आता था, वही दूर हुआ,
शोर में गुम हो गई फिर, वो इज़्ज़त हमारी।
हम न शिकवा करें, न ही इल्ज़ाम धरें अब,
आईने ने ही बता दी हमें हक़ीक़त हमारी।
February 1, 2026
ग़ज़ल